blog – Garh Bairat https://garhbairat.com National News Portal Fri, 03 Jan 2025 04:48:39 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.3 https://garhbairat.com/wp-content/uploads/2025/02/cropped-Garh-Bairat-Logo.png-512x512-1-48x48.png blog – Garh Bairat https://garhbairat.com 32 32 आधुनिकता के अनेक सार्थक पक्ष भी हैं जो समाज को बेहतर बनाते हैं https://garhbairat.com/modernity-also-has-many-positive-aspects-that-make-society-better/ https://garhbairat.com/modernity-also-has-many-positive-aspects-that-make-society-better/#respond Fri, 03 Jan 2025 04:48:38 +0000 https://garhbairat.com/?p=12568

भारत डोगरा
आधुनिक समाज में अनेक स्तरों पर जटिलताएं बढ़ रही हैं। तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं, और सामान्य जनजीवन पर उनका असर बड़े स्तर पर हो रहा है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया को ही लें तो इनका बहुत व्यापक असर हुआ है। दैनिक जीवन को हमने कई स्तरों पर कम समय में ही बदल दिया है। इनमें कुछ असर अच्छे हो सकते हैं, और कुछ बुरे। इस पर बहस हो सकती है, पर एक अधिक व्यापक सच्चाई यह है कि तकनीकी बदलाव में इतनी अधिक तेजी हुई है कि हमें उसे संतुलित और सुलझे हुए रूप में अपनाने के अवसर नहीं मिलते हैं। हम अभी संभलने की क्षमता प्राप्त कर ही रहे होते हैं कि तब तक बहुत कुछ गड़बड़ा जाता है। मुद्दा केवल तकनीकी बदलाव का ही नहीं है, बल्कि इससे आगे यह भी है कि इस बदलाव को विशेष दिशा में धकेलने के प्रयास साथ-साथ होते हैं। ये प्रयास प्राय: किसी भले उद्देश्य से नहीं जुड़े होते हैं अपितु शक्तिशाली और अति साधन-संपन्न तत्वों के अपना मुनाफा, नियंत्रण और आधिपत्य बढ़ाने की संकीर्ण सोच से जुड़े होते हैं। तकनीकी बदलावों के साथ ही लोगों की सोच को और कायरे को प्रभावित करने वाले पुराने स्रेतों का महत्त्व तेजी से कम होने लगता है, जबकि नये स्रेत हावी होने लगते हैं। इस स्थिति में समाज में नैतिकता की जो बहुत महत्त्वपूर्ण स्थिति और पहचान है, वह भी बहुत प्रभावित होती और बदलती है। क्या बुरा है और क्या गलत है, ऐसे बुनियादी सवाल और उनके जवाब नई तरह से प्रभावित होने लगते हैं। ऐसी कई प्रवृत्तियों, जिन्हें सामाजिक बुराई के रूप में मान्यता मिली हुई थी और ऐसी मान्यता मिलना तथ्य आधारित था, को अब बुराई माना ही नहीं जाता। गलत राह से रोकने के लिए जो सोच समाज में मौजूद थी, वही खिसकने लगती है।

इस तरह से एक ओर तो समाज में अनेक बुराइयां तेजी से फैल सकती हैं और इस कारण अनेक नये तनाव और समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके साथ-साथ समाज में कई मुद्दों पर अनिश्चय बढऩे की स्थिति आ सकती है। अनिश्चय की इस स्थिति के एक ओर तो अपने तनाव हैं और दूसरी ओर इसमें अनुचित तत्वों को अपना असर बढ़ाने के अधिक अवसर मिलते हैं। अत: ऐसे दौर और समय में रेखांकित करना और जोर देकर कहना बहुत जरूरी हो जाता है कि सामाजिक नैतिकता के अनेक शात तथ्य ऐसे हैं जो सदा महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक थे, आज भी हैं और सदा प्रासंगिक रहेंगे। एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि अपनी भलाई को समाज की भलाई के साथ जोड़ कर ही आगे बढ़ा जाए। इसके लिए जरूरी है कि सभी की भलाई, समाज की भलाई के बारे में सही समझ बनाने का प्रयास किया जाए जो समता, न्याय, अमन-शांति और पर्यावरण रक्षा जैसे बहुत व्यापक मान्यता के प्रतिष्ठित सिद्धांतों पर आधारित हो। अपनी प्रगति के बारे में सोचना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, पर सामाजिक नैतिकता की मांग है कि इस प्रगति की ऐसी राह अपनाई जाए जो सामाजिक भलाई से जुड़ी रहे और किसी भी तरह की सामाजिक क्षति से बचे। स्वयं की प्रगति के लिए, इस प्रगति में तेजी लाने के लिए अपनी क्षमताओं का भरपूर विकास करना उचित है, पर इसके लिए किसी और को क्षति पहुंचाना और समाज को क्षति पहुंचाना अनुचित है।

इस सोच का निष्कर्ष तो यही है कि मेहनत और सच्चाई की जिंदगी ही सबसे उचित जिदंगी है। यह एक शात सत्य है, सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है, पर आज इस तरह की बातें बहुत कम सुनी जाती हैं, या कोई फिर भी कह दे, तो कई बार इसे महज उपदेश या ओल्ड फैशन सोच कहा जाता है। इससे यही सिद्ध होता है कि तेज बदलाव के आधुनिक युग में सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण पक्ष उपेक्षित और आहत ही रहे हैं, पर इससे सामाजिक नैतिकता के महत्त्वपूर्ण और शात पक्षों का महत्त्व कम नहीं होता है। हां, इतना जरूर है कि इन्हें रेखांकित करना, इनकी याद दिलाना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।

इसी तरह सामाजिक संबंधों को बहुत ईमानदारी से निभाना सामाजिक नैतिकता का बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इन नजदीकी संबंधों को आपसी गहरे विास के आधार पर बनाए रखना, इस विास को कभी नहीं तोडऩा मानव-जीवन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। गहरे विास पर आधारित यह संबंध अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है और साथ में सच्चाई, मेहनत, ईमानदारी पर आधारित जीवन के लिए ऐसे प्रगाढ़ संबंधों से बहुत सहारा भी मिलता है। ऐसे जीवन में कठिनाइयां भी आती हैं और आज के आधुनिक दौर में कई तरह से यह संभावना अधिक बढ़ गई है। अत: सुख-दुख, उतार-चढ़ाव के बीच अपना संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। कठिनाई और दुख की स्थिति में अपने को संभाल पाना और इसके लिए अपने नैतिक जीवन के आधार से मजबूती प्राप्त करना आवश्यक है। दूसरी ओर अधिक सफलता मिल जाने पर अपने संतुलन को बनाए रखना, अपने नैतिक मार्ग पर दृढ़ रहना और हर तरह के अहंकार और सफलता के अनुचित दोहन से बचना आवश्यक है।

जिस तरह की सामाजिक नैतिकता की जरूरत समाज को सदा रही है और तेज बदलावों के आधुनिक दौर में विशेष तौर पर है, उसे प्रतिष्ठित करने के प्रयास आज बहुत जरूरी हैं पर फिर भी उपेक्षित हैं। दूसरी ओर, इस तरह के चालू प्रवृत्ति के प्रयत्न अधिक देखे जाते हैं जिनमें चालाकी से एक तरह से लोगों को भ्रमित कर किसी असरदार व्यक्ति के नेतृत्व में लाया जाता है और उनकी भावनाओं का दोहन किया जाता है। ऐसे प्रयासों के स्थान पर सही तरह की सामाजिक नैतिकता प्रतिष्ठित हो तो समाज की उचित और संतुलित प्रगति से बहुत मदद मिलेगी।

मौजूदा दौर में अनेक गंभीर समस्याओं के बढऩे का एक व्यापक स्तर का कारण यह है कि इन समस्याओं पर नियंत्रण लगाने वाली जो नैतिकता आधारित मान्यताएं समाज में मौजूद थीं, उनका तेजी से हृास हुआ है। भ्रष्टाचार बढऩे का एक मुख्य कारण यह है तो दूसरी ओर, अन्य संदर्भ में, तरह-तरह के बढ़ते नशे की प्रवृत्ति को समझने के लिए भी इस तरह के बदलाव को समझना पड़ेगा जो बहुत स्पष्ट चाहे नजर न आएं पर बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। महिलाओं के विरुद्ध विशेष तरह की हिंसा और अपराधों को भी इस व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आधुनिकता अपने आप में बुरी है। आधुनिकता के अनेक सार्थक पक्ष भी हैं जो समाज को बेहतर बनाते हैं, या बना सकते हैं। पर समाज में व्यापक स्तर पर समझ बनानी होगी कि आधुनिकता के नाम पर जो कुछ समाज में आ रहा है और तेजी से आ रहा है, उसमें क्या अनुचित है, और क्या उचित है ताकि इस समझ के आधार पर आधुनिकता को हम सुलझे हुए और संतुलित आधार पर अपना सकें।

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दक्षेस से भारत को सतर्क रहने की जरूरत https://garhbairat.com/india-needs-to-be-cautious-about-saarc/ https://garhbairat.com/india-needs-to-be-cautious-about-saarc/#respond Thu, 02 Jan 2025 05:01:17 +0000 https://garhbairat.com/?p=12532

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने
महाशक्तियों की राजनीतिक और आर्थिक महत्त्वाकांक्षाओं ने तीसरी दुनिया के उभरने की संभावनाओं को सुनियोजित तरीके से खत्म कर दिया है। इसका प्रतिबिंब है दक्षिण एशिया और इन देशों का क्षेत्रीय संगठन दक्षेस जिसे सार्क भी कहा जाता है। अमेरिकी प्रभाव में पाकिस्तान की जमीन का सैन्य कार्यों के लिए उपयोग और नेपाल के आधे-अधूरे लोकतंत्र पर चीनी कम्युनिज्म की काली छाया के चलते दक्षिण एशिया के देशों को एकजुट रखने का ख्वाब कई दशकों पहले ही टूट चूका है। इस क्षेत्र में विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक मुद्दों पर गहरे तनाव  बढ़े हैं तथा सांस्कृतिक टकराव की स्थितियां भी निर्मिंत हो गई है।

इन जटिल स्थितियों ने सबसे ज्यादा चोट दक्षेस की स्थापना को पहुंचाई है जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया को एकजुट करना और इसके देशों के बीच समृद्धि, विकास और शांति को बढ़ावा देना बताया जाता था। हाल ही में बांग्लादेश और पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष किसी तीसरे देश में मिले और उनके बीच सार्क को पुनर्जीवित करने पर बात हुई तो इसमें संभावनाएं कम और मनोवैज्ञानिक दबाव की कूटनीति ज्यादा नजर आई। दरअसल, बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत के इस पड़ोसी देश की राजनीतिक परिस्थितियों में भी भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लंबे समय से सत्ता पर काबिज शेख हसीना के खिलाफ छात्रों का आंदोलन देश में राजनीतिक परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन बाद में कट्टरपंथी शक्तियों के प्रभाव में अब यह भारत विरोध के आंदोलन में परिवर्तित हो गया है। बांग्लादेश की मौजूदा अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनूस की पाकिस्तान के साथ राजनीतिक मुद्दों पर समाधान की जल्दबाजी की कोशिशों  में सकारात्मक पहल से ज्यादा भारत पर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने की कूटनीति ज्यादा नजर आ रही है और इसकी छाया दक्षिण एशिया के देशों के बीच आपसी सहयोग की संभावनाओं को पूरी तरह खत्म कर सकती है। सार्क में आठ देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल है। 8 दिसम्बर 1985 को काठमांडू, नेपाल से शुरू हुए इस क्षेत्रीय संगठन को तीसरी दुनिया के हितों के संरक्षण के लिए उम्मीदों के तौर पर देखा गया था और यह विश्वास किया गया था कि यह एक साझी आवाज होगी जिससे  इन देशों को वैश्विक मंच पर अपने मुद्दों को उठाने में मदद मिल सके। दक्षेस का पहला शिखर सम्मेलन 1985 में आयोजित हुआ था और इसके बाद से यह संगठन तमाम विरोधाभासों के बाद भी विभिन्न देशों के नेताओं की बैठकें आयोजित करता रहा है। यह संगठन क्षेत्रीय संघर्ष, आतंकवाद, नशीले पदाथरे की तस्करी और सीमा विवादों के समाधान के संभावनाओं पर भी काम करता है। दक्षिण एशिया दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात सभ्यताओं में से एक सिंधु सभ्यता का घर है और दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। जातीय, भाषाई और राजनीतिक विखंडन के इतिहास के बावजूद, इस क्षेत्र के लोग एक समान सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टिकोण से एकजुट माने जाते हैं।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक की एक रिपोर्ट में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की स्थिति बेहद निम्नतम बताई गई है। जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी से भुखमरी का संकट तो बढ़ा ही है साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं भी विकराल हो गई है। दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक उथल-पुथल के शिकार रहे हैं और भारत को छोडक़र अन्य देशों में अस्थिरता का अंदेशा बना रहता है।  दक्षेस की स्थापना का उद्देश्य दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग से शांति और प्रगति हासिल करना बताया गया था, लेकिन विभिन्न देशों के बीच विवाद इस पर पूरी तरह हावी रहे और इसी का परिणाम है कि दुनिया की बड़ी आबादी वाला यह संगठन आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में विफल रहा है। चीन जैसी विदेशी संस्थाओं पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। नेपाल और श्रीलंका की भी कुछ यही स्थिति है। दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान का मानवीय संकट बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच गया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश गरीबी से बेहाल है। यहां दो करोड़ से ज्यादा लोगों पर भुखमरी का संकट गहरा रहा है और लोगों की जिंदगी मुश्किल में है। तालिबान के आने के बाद वैश्विक आर्थिक मदद बंद  हो गई है और अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं। अफग़़ान सरकार की संपत्ति,केंद्रीय बैंक का रिज़र्व सब फ्रीज़ कर दिया गया है। प्रतिबंधों के कारण वहां की अर्थव्यवस्था लडखड़़ा गई है। मालदीव,बंगलादेश औए श्रीलंका चीन की कर्ज नीति के जाल में पूरी तरह फंस चूके है। दक्षिण एशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान है और सभी देशों को अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने देने के लिए सतर्क रहने की जरूरत होती है। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि दक्षेस के देश आपसी व्यापार और सम्बन्धों को बेहतर करके आपसी सहयोग को बढ़ाएं।

चीन जैसे देश का हस्तक्षेप दक्षिण एशिया के देशों के लिए घातक साबित हो रहा है। बांग्लादेश और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के विकल्प के तौर पर चीन को प्रस्तुत करना चाहते है। इस क्षेत्र में चीन के लिए युआन को मजबूत करने के गहरे अवसर भी है।  युआन कूटनीति में अधिनायकवाद, साम्यवादी आक्रामकता और मानवाधिकारों की अनदेखी शामिल है।  राजनीतिक अस्थिरता से अभिशिप्त दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव पृथकतावाद को बढ़ावा दे रहा है और कई देशों की संप्रभुता को भी खतरे में डाल रहा है। भारत पर सामरिक दबाव बढ़ाने के लिए चीन ने भारत के पड़ोसी देशों में सहायता की कूटनीति से अपना प्रभाव बढ़ाया है। अब दक्षेस पर उसकी नजर है। दक्षेस में कभी भारत की राजनीतिक हैसियत बहुत मजबूत हुआ करती थी, लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी है। भविष्य में यह भारत विरोधी देशों का मंच नहीं बन जाए इसे लेकर भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।

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एक अच्छे, भले और नेक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह https://garhbairat.com/a-good-noble-and-virtuous-prime-minister-dr-manmohan-singh/ https://garhbairat.com/a-good-noble-and-virtuous-prime-minister-dr-manmohan-singh/#respond Wed, 01 Jan 2025 05:01:42 +0000 https://garhbairat.com/?p=12499

हरिशंकर व्यास
शीर्षक चौंका सकता है। पर जरा समकालीन भारत अनुभवों और उनकी दिशा में झांके तो अगले बीस-पच्चीस वर्षों की क्या भारत संभावना दिखेगी? भारत पिछले दस वर्षों की विरासत में कदम उठाता हुआ होगा। इस विरासत का मंत्र और अनुभव बुद्धि नहीं लाठी है। हार्वर्ड नहीं हार्डवर्क है। सत्य नहीं झूठ है। सौम्यता नहीं अहंकार है। विनम्रता नहीं निष्ठुरता है। कानून नहीं बुलडोजर है। मान मर्यादा नहीं लंगूरपना है। विचार और बहस नहीं गाली तथा ट्रोल है। तर्क नहीं है लाठी है। प्रबुद्धता नहीं मूर्खता है। चाल, चेहरा, चरित्र नहीं, बल्कि अकड़, लालच और कदाचार है। इस तरह का निष्कर्ष 2014 के समय में अकल्पनीय था। तब अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी के हुंकारों, आंदोलनों के उमड़े जन सैलाबों की तलहटी में सत्य छुपा हुआ था। अज्ञात था। ऐसा होना हम हिंदुओं की नियति से है। हिंदुओं का भाग्य है जो वह गांधी के पीछे चले या अन्ना हजारे के या हाथ में कमल ले कर चले या झाडू, उसे वही झूठा अवतार मिलता है जो उसकी कलियुगी नियति है।

उस नाते डॉ. मनमोहन सिंह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपवाद थे। वे अकेले प्रधानमंत्री हैं, जिनकी शख्सियत ने झूठ, फरेब से लोगों का बहकाने, लोगों में जादू बनाने, दैवीय अवतार की इमेज बनाने, लोगों को डराने धमकाने या उनके वोट खरीदने जैसा वह कोई छल नहीं किया, वह राजनीति नहीं की जो आजाद भारत की राजनीति का ट्रेंडमार्क है। बावजूद इसके वे भारत के वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री थे। उसी के कर्म फल में वैश्विक बिरादरी तक ने, उन्हे स्मरण करते हुए एक युगांतरकारी, बुद्धिमान, समझदार, सौम्य और श्रेष्ठ प्रधानमंत्री की सच्ची भाव भंगिमा में श्रद्धांजलि दी है।

यह वस्तुनिष्ठ श्रद्धांजलि पिछले दस वर्षों के नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल के शासन अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में, समकालीन अनुभवों के संदर्भ तथा भारत की भावी दिशा के भान से भी है। इतिहास की कसौटी है जो घटना और नेतृत्व का मूल्यांकन पचास साल बाद किया जाता है। कोई युद्ध हुआ, राजा या प्रधानमंत्री मरा तो उसके बाद के अनुभवों, प्रभावों के पच्चीस-पचास साल बाद ही इतिहास फैसला लेता है कि नेहरू ने भारत बनाया था या बिगाड़ा था। नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया और उसकी विरासत के प्रधानमंत्री और राजनीति देश हित में थी या देश को बरबादी की और ले जाने वाली। डॉ. मनमोहन सिंह की शख्सियत कर्तव्यनिष्ठ थी। इतिहास निरपेक्ष थी। शासन के आखिर में जरूर उन्होंने अन्ना हजारे-केजरीवाल-मोदी के भूचालों में अपने मुंह से यह बोला था, उम्मीद जताई थी कि इतिहास उनके प्रति दयालु होगा!
और मेरी राय में उनका इतिहास भारत के आखिरी बुद्धिमान, उम्दा प्रधानमंत्री के नाते अमिट है। एक अच्छे’, भले’ और नेक’ प्रधानमंत्री। और सोचें, इन तीन शब्दों से अधिक मनुष्यों के बीच मनुष्य को और क्या पुण्यता चाहिए!

मैंने बतौर पत्रकार उनके प्रधानमंत्री रहते उनकी आलोचना की है तो उनकी प्रशंसा भी की। तारीफ खासकर तब जब डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका के साथ एटमी करार के लिए अपनी सरकार दांव पर लगाई थी। जिस वाम मोर्चे पर मनमोहन सरकार टिकी थी उसके घोर विरोध, सीपीएम नेता प्रकाश करात द्वारा सैद्धांतिक आधार पर वैयक्तिक प्रतिष्ठा दांव पर लगाने तथा वामपंथी पत्रकारों की चिल्लपों, सोनिया गांधी व अहमद पटेल की चिंताओं के बावजूद मनमोहन सिंह ने एटमी करार किया। भारत का वैश्विक अछूतपन मिटाया। वह फैसला देश की सामरिक चिंता, सुरक्षा, भू राजनीति और वैश्विक जमात में भारत के स्थान के खातिर वैसा ही दुस्साहसी फैसला था जैसा मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की कमान में वित्त नीति में परिवर्तनों का था।

मेरा पीवी नरसिंह राव के समय से ऑब्जर्वेशन रहा है कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कभी यह नहीं कहा कि उनके कारण आर्थिक सुधार और उदारवाद आया। वे कभी अहंकार में या अनजाने में भी यह नहीं बोले कि मैंने, या मेरे कारण भारत के उदारवादी निर्णय हुए। इसलिए क्योंकि वे पीवी नरसिंह राव की बुद्धिमत्ता, दूरदृष्टि और समझदारी के कायल थे। मेरा डॉ. मनमोहन सिंह से कभी नाता नहीं रहा लेकिन मैं पीवी नरसिंह राव, प्रधानमंत्री दफ्तर संभालने वाले भुवनेश चतुर्वेदी, पीवीआरके प्रसाद और इनके घेरे को गहराई से जानता था इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण में सामने था कि कैसे राजनीतिक दबावों, कैबिनेट के भीतर की चुनौतियों और दस, जनपथ की चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री के कवच से डा. मनमोहन सिंह ने पहला साहसी बजट पेश किया। कैसे खुद प्रधानमंत्री ने स्वंय उद्योग मंत्रालय संभालते हुए लाइसेंस, परमिट राज को खत्म करने की घोषणाएं कीं!

वह मौनी बाबा की मौन क्रांति थी। तभी स्वतंत्र भारत के इतिहास का सत्य है कि बुद्धि, विवेक और समझदारी के प्रतिमान पीवी नरसिंह राव ने उबलते पंजाब, बागी कश्मीर तथा अराजक उत्तर-पूर्व को सामान्य बनाया तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस को भी विवेक से सहा। दिलचस्प संयोग है कि पीवी नरसिंह राव ने पांच साल के आखिर में तथा मनमोहन सिंह ने दस साल शासन के आखिर में, दोनों ने एक जैसे बवंडरों का सामना किया। बावजूद इसके इतिहास दोनों के प्रति दयालु है। दुनिया में यदि भारत के वित्तीय, आर्थिक, सामरिक तथा कूटनीतिक प्रतिमानों में किसी को याद किया जाता है तो उनमें भारतीय नाम पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के हैं। अद्भुत है! स्मृति पर जोर डालें। याद करें पीवी नरसिंह राव, के खिलाफ अर्जुन सिंह, फोतेदार, नटवर सिंह, नारायण दत्त तिवारी सहित कांग्रेस के तमाम दरबारियों, वामपंथी-सेकुलर आलोचकों से लेकर हर्षद मेहता, जेठमलानी, अचार कारोबारी लक्खू भाई और विश्वासघाती सीताराम केसरी जैसे चेहरों के बनाए झूठे बवंडर को। सभी को इतिहास मिट्टी की धूल सा मिटा चुका है। और इतिहास में कीर्ति अंकित है तो वह नरसिंह राव की है। ऐसे ही याद करें, मनमोहन सिंह के खिलाफ बवंडर पैदा करने वाले विनोद राय, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी एंड पार्टी को! क्या इनमें से कोई एक भी सच्चा साबित हुआ? जो लोग नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को भगवान, अवतार, मसीहा मानते हैं, उन्हें और उनकी भावना को दरकिनार करके सोचें तो मनमोहन सिंह ने मनुष्य रूप में दस वर्ष भारत का जो शासन किया वह किस कसौटी पर बुरा था? क्या वे भ्रष्ट प्रमाणित हैं? क्या पूंजीवाद और उदारवाद के आस्थावान डॉ. मनमोहन सिंह पर ये आरोप हैं कि उनकी बदौलत गौतम अडानी जैसे किसी क्रोनी पूंजीपति ने भारत को चूना लगाया। दुनिया में भारत को बदनाम बनाया?

ये बातें देश की एकता-अखंडता, इतिहास के मायनों में क्षणिक और बेमानी हैं। इसलिए अहम बात भारत के आखिरी बुद्धिवान, उम्दा प्रधानमंत्री’ का शीर्षक है। क्यों कर ऐसा माना जाए? जवाब पर यह विचार करें कि नरेंद्र मोदी का अब तक का शासन वतर्मान और भविष्य का क्या रास्ता बनाए हुए है? जाहिर है नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया, नेहरू-गांधी परिवार के खूंटे के आइडिया से अलग एक भारत। अर्थात उस हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया का भारत, जिसका खूंटा संघ परिवार है। मान सकते हैं समकालीन भारत दो खूंटों की नियति लिए हुए है। स्वतंत्रता के बाद कोई साठ साल भारत गांधी-नेहरू परिवार के खूंटे से चला। अब समय संघ परिवार के खूंटे का है। और नरेंद्र मोदी के अवतार से हिंदू क्योंकि कथित तौर पर जागे हैं और वे देश और अपनी सुरक्षा में मुसलमान को चिन्हित किए हुए हैं तो जाहिर है उनकी प्राथमिक आवश्यकता क्या है? छप्पन इंची छाती का निरंतर नेतृत्व। इसलिए नरेंद्र मोदी की विरासत में आगे की राजनीति के चेहरों में अमित शाह हों या योगी आदित्यनाथ या हिमंता बिस्वा या देवेंद्र फडऩवीस, छप्पन इंची छाती के नेतृत्व, राजनीति और व्यवस्था की आवश्यकता स्थायी है। दूसरे शब्दों में भारत का गवर्नेंस शक्ति, वाक् शक्ति, भय बिन होय न प्रीत के लाठी दर्शन से ही चलेगा। शत्रु क्योंकि इतिहास और मुसलमान है तो पानीपत की लड़ाई का सिनेरियो भी तय है।  तभी नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ आदि का भारत जब भविष्य में हर जिले में एक हिंदुस्तान और एक पाकिस्तान लिए हुए होगा तो कल्पना संभव भी है कि दिल्ली के तख्त को कभी बुद्धिमत्तापूर्ण, विवेकी, समझदार, सौम्य शख्सियत के बैठने का गौरव प्राप्त हो?

और हां, यह भी जान लेना चाहिए कि संघ के खूंटे के समानांतर अब जो गांधी-नेहरू-सेकुलर खूंटा है वह खरबूजे को देख खरबूजे जैसी राजनीति करते हुए है। इसलिए सार्वजनिक जीवन और राजनीति में बुद्धि, विचार, बहस, विवेक, सौम्यता, भद्रता, अच्छापन, पढ़ाई-लिखाई आदि का अर्थ ही नहीं है। भारत अब वह बीहड़ है जिसमें मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंह राव जैसी शख्सियतों की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए फिर नोट करें डॉ. मनमोहन सिंह: भारत के आखिरी बुद्धिमान और उम्दा प्रधानमंत्री थे!

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बिजली चोरी या फिर अवैध निर्माण जवाबदेही तय हो https://garhbairat.com/accountability-should-be-fixed-for-electricity-theft-or-illegal-construction/ https://garhbairat.com/accountability-should-be-fixed-for-electricity-theft-or-illegal-construction/#respond Tue, 31 Dec 2024 05:08:07 +0000 https://garhbairat.com/?p=12466

रोहित कौशिक
इस समय उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर बिजली विभाग किसी भी रूप से बिजली चोरी करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। अतिक्रमण करने और अवैध कब्जा करने वाले लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई कर अवैध कब्जों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। निश्चित रूप से समाज में संदेश जाना चाहिए कि जो भी गलत काम करेगा उस पर कार्रवाई की जाएगी। ऐसा संदेश जाएगा तो लोग अवैध काम करने से डरेंगे और बेहतर व्यवस्था और अच्छा समाज बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन क्या ऐसी कार्रवाई करने की बात इतनी सरल है?

अनेक लोग इस तरह की कार्रवाई को गलत बता रहेैहैं। कुछ लोगों का आरोप है कि राजनीतिक द्वेष के कारण भी इस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नियमित रूप से इस तरह की कार्रवाई की जाती है? क्या नियमित रूप से देखा जाता है कि कहां बिजली चोरी हो रही है, और कहां लोगों ने अवैध रूप से मकान बनाए हुए हैं, या कब्जे किए हुए हैं? हो सकता है कि अपवाद के तौर पर कहीं ऐसा होता हो लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता। ज्यादातर मामलों में इस तरह की कार्रवाई किसी शिकायत या फिर अन्य कारणों से होती है।

सवाल है कि सामान्य तौर पर ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं होती? सामान्य तौर पर संबंधित कर्मचारी और अधिकारी क्या कर रहे होते हैं? कई मामलों में कर्मचारी और अधिकारी रित लेकर चुप हो जाते हैं, और अवैध काम की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं।  निश्चित रूप से भारत लगातार विकास की राह पर अग्रसर है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश में रित का खात्मा  नहीं हो सका है। भरे बाजार में बिना नक्शा पास हुए बड़ी-बड़ी बिल्डिंग कैसे बन जाती हैं? किसी सुनसान जगह पर ऐसी बिल्डिंग बने तो बात समझ में आती है कि उस बिल्डिंग पर किसी अधिकारी की नजर नहीं पड़ी होगी। लेकिन ऐसे मुख्य बाजार और ऐसी मुख्य सडक़, जहां से अधिकारी रोज गुजरते हैं, पर भी अवैध निर्माण धड़ल्ले से होते हैं।

समझ से परे है कि ऐसे निर्माण पर अधिकारियों का ध्यान क्यों नहीं जाता। जब ऐसी अवैध इमारतों में कोई हादसा हो जाता है, या इनकी शिकायत की जाती है तो अधिकारी तुरंत हरकत में जा जाते हैं। विपक्ष से जुड़े नेता की बिल्डिंग पर कार्रवाई होने में देर नहीं लगती। इसका सीधा सा अर्थ है कि संबंधित विभाग के कर्मचारी और अधिकारी जानबूझ कर अवैध निर्माण को प्रश्रय देते हैं, और जब अवैध निर्माण हो जाते हैं तो उन्हें ध्वस्त करने का डर दिखा कर उगाही की जाती है। आम तौर पर अवैध इमारतों के मालिकों को पहले नोटिस दिया जाता है। नोटिस देने के बाद ही अवैध निर्माण  को ध्वस्त किया जाता है।

लेकिन अक्सर नोटिस देने की प्रक्रिया में भी धांधली होती देखी गई है। कई लोगों ने आरोप लगाए हैं कि इमारत गिराने से पहले उन्हें नोटिस नहीं दिया गया। किसी भी रूप से बिजली की चोरी की जाएगी या फिर अवैध निर्माण किए जाएंगे तो इसका असर समाज और अंतत: देश पर ही पड़ेगा। ज्यों-ज्यों देश विकसित हो रहा है, त्यों-त्यों देश में बिजली की खपत भी बढ़ रही है। हालांकि पहले की अपेक्षा देश में बिजली उत्पादन बढ़ा है, लेकिन किसी भी तरह से बिजली चोरी होती है तो इसका असर बिजली की कुल क्षमता पर पड़ता है। भले सरकार बिजली निर्माण के लिए कितने भी नये बिजलीघर लगा ले लेकिन बड़े पैमाने पर हो रही बिजली चोरी नहीं रोकी गई तो इन बिजलीघरों का पूरा लाभ देश को नहीं मिल पाएगा। ऐसा नहीं है कि गरीबी के कारण ही लोग बिजली चोरी करते हैं, बड़ी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां भी बिजली चोरी करती पकड़ी जाती हैं।

पहले से ज्यादा शिक्षित समाज के कुछ लोगों को अवैध काम करने में न ही शर्म आती है, और न किसी तरह का डर होता है। अवैध काम करने के पीछे सारा दोष हमारी मानसिकता का है। इसी मानसिकता के चलते पहले हम गलत काम करते हैं, और बाद में रित देकर गलत काम को वैधता प्रदान करने की कोशिश करते हैं। कोढ़ में खाज यह कि प्रशासन और संबंधित कार्यालय पहले हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहता है, और बाद में खुद को ईमानदार साबित करने की कोशिश करता है।

यही कारण है कि इस सारी व्यवस्था में दोनों पक्ष यानी जिन पर कार्रवाई होती है, और जो कार्रवाई करते हैं, कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाते नजर आते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि बिजली चोरी  और अवैध निर्माण करने वालों पर तो कार्रवाई हो जाती है, लेकिन संबंधित विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बेहतर तो यह होगा कि ऐसे मामलों में विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो। उनसे पूछा जाए कि जब इस तरह के अवैध काम हो रहे थे तो वे कहां थे। निश्चित रूप से इस प्रक्रिया से एक बेहतर व्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी।

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अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे ? https://garhbairat.com/how-are-eggs-non-violent-and-vegetarian/ https://garhbairat.com/how-are-eggs-non-violent-and-vegetarian/#respond Mon, 30 Dec 2024 04:43:57 +0000 https://garhbairat.com/?p=12429

रजनीश कपूर
विज्ञापन जगत ने आम जनता के मन में एक बात बिठा दी है कि अंडे शाकाहारी नहीं हैं। अंडे का उपयोग बढ़ाने के लिए इसे प्रोटीन का बढिय़ा स्रेत बताया जाता है। प्रोटीन की मात्रा बहुत सारी शाकाहारी चीजों में भी काफी ज्यादा है पर इस विवाद में नहीं भी पड़ा जाए तो यह तथ्यात्मक रूप से गलत है कि अंडा शाकाहारी है। इसलिए शाकाहारियों के लिए अंडे को लोकप्रिय बनाने के लिए किए जाने वाले प्रचार का उल्टा नारा लगाया जा सकता है – ‘संडे हो या मंडे, कभी न खाओ अंडे’। कोई क्या खाए और क्या नहीं इसमें बहुत कुछ आदमी की अपनी पसंद और जीवनशैली के साथ-साथ कई अन्य बातों पर निर्भर करता है। फिर भी आप जो चीज खाते हैं या किसी कारण से नहीं खाते हैं उसके बारे में आपको आवश्यक जानकारी अवश्य होनी चाहिए।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 100 ग्राम अंडों में जहां 13 ग्राम प्रोटीन होगा, वहीं पनीर में 24 ग्राम, मूंगफली में 31 ग्राम, दूध से बने कई पदाथरे में तो इससे भी अधिक एवं सोयाबीन में 53 ग्राम प्रोटीन होता है। यही तथ्य कैलोरी के बारे में है। जहां 100 ग्राम अंडों में 173 कैलोरी, मछली में 93 कैलोरी व मुर्गे के गोश्त में 194 कैलोरी प्राप्त होती है, वहीं गेहूं व दालों में 300 कैलोरी, सोयाबीन में 350 कैलोरी व मूंगफली में 550 कैलोरी और मक्खन निकले दूध एवं पनीर से लगभग 350 कैलोरी प्राप्त होती है तो हम यह निर्णय ले सकते हैं कि स्वास्थ्य के लिए क्या चीज जरूरी है? यह स्पष्ट करना भी उचित रहेगा कि अधिक कोलेस्ट्रोल शरीर के लिए लाभदायक नहीं है।

100 ग्राम अंडों में कोलेस्ट्रोल की मात्रा 500 मिलीग्राम है और मुर्गी के गोश्त में 60 है तो वही कोलेस्ट्रोल सभी प्रकार के अन्न, फलों, सब्जियों आदि में शून्य है। अमेरीका के विविख्यात विशेषज्ञ डॉ. माइकेल कलेपर का कहना है कि अंडे का पीला भाग विश्व में कोलेस्ट्रोल एवं जमी चिकनाई का सबसे बड़ा स्रेत है जो स्वास्थ्य के लिए घातक है। उन्होंने यह भी साबित किया है कि जो व्यक्ति मांस या अंडे खाते हैं उनके शरीर में ‘रिस्पटरों’ की संख्या में कमी हो जाती है जिससे रक्त के अन्दर कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक हो जाती है। इससे हृदय रोग शुरू हो जाता है और गुर्दे के रोग एवं पथरी जैसी बीमारियों को भी बढ़ावा मिलता है। वास्तविकता यह है कि 1962 में यूनीसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की तथा अंडों को लोकप्रिय बनाने के लिए अनिषेचित (इनफर्टाइल) अंडों को शाकाहारी अंडे (वेजीटेरियन) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया।

1971 में मिशिगन यूनीर्वसटिी (अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ. फिलिप जे. स्केन्ट ने यह सिद्ध किया कि: अनिषेचित अंडे किसी भी प्रकार से शाकाहारी नहीं होते क्योंकि वे न तो पेड़ों पर उगते हैं और न किसी पौधे पर बल्कि वे सब मुर्गी के पेट में से ही उत्पन्न होते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोग के आधार पर यह देखा गया है कि विद्युत धारा के द्वारा अंडों को आंका जा सकता है। अनिषेचित अंडे में निषेचित अंडे की भांति ही यह विद्युत धारा होती है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि निर्जीव वस्तु में कभी भी विद्युत धारा का अंकन नहीं किया जा सकता। विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी प्राणी के जीवन का आधार मात्र लैंगिक प्रजनन क्रिया ही नहीं है बल्कि अलैंगिक प्रजनन के द्वारा भी जीवन हो सकता है जैसे अमीबा और अनेक एककोशीय प्राणी बिना निषेचन क्रिया के उत्पन्न होते रहते हैं। इसी प्रकार से ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ या उसके द्वारा उत्पन्न प्राणी निर्जीव नहीं गिने जा सकते।

सच्चाई यह है कि अंडे दो प्रकार के होते हैं एक वे जिनसे बच्चे निकल सकते हैं तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। मुर्गी यदि मुर्गे के संसर्ग में न आए तो भी जवानी में अंडे दे सकती है। इन अंडों की तुलना स्त्री के रज:स्रव से की जा सकती है। जिस प्रकार स्त्री के मासिक धर्म होता है। उसी तरह मुर्गी के भी यह धर्म अंडों के रूप में होता है। यह अंडा मुर्गी की आंतरिक गंदगी का परिणाम है। मुर्गियां जो अंडे देती हैं वे सब अपनी स्वेच्छा से या स्वभावतया नहीं देतीं! बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फर्मयुलेशन के इंजेक्शन दिए जाते हैं। इन इंजेक्शनों के कारण ही मुर्गियां लगातार अंडे दे पाती हैं। अंडे के बाहर आते ही उसे इन्क्यूबेटर (सेटर) में डाल दिया जाता है ताकि उसमें से 21 दिन की जगह 18 दिनों में ही चूजा बाहर आ जाए।

मुर्गी का बच्चा जैसे ही अंडे से बाहर निकलता है नर तथा मादा बच्चों को अलग-अलग कर लिया जाता है। मादा बच्चों को शीघ्र जवान करने के लिए एक खास प्रकार की खुराक दी जाती है और इन्हें चैबीसों घंटे तेज प्रकाश में रखकर सोने नहीं दिया जाता ताकि ये दिन रात खा-खा कर जल्दी ही रज:स्रव करने लगें और अंडा देने लायक हो जाएं। अब इन्हें जमीन की जगह तंग पिंजरों में रख दिया जाता है। इन पिंजरों में इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती हैं कि वे पंख भी नहीं फडफड़़ा सकतीं। तंग जगह के कारण आपस में चोंचें मारती हैं, जख्मी होती हैं, गुस्सा करती हैं व कष्ट भोगती हैं। जब मुर्गी अंडा देती है तो अंडा जाली में से किनारे पडक़र अलग हो जाता है और उसे अपनी अंडे सेने की प्राकृतिक भावना से वंचित रखा जाता है ताकि वह अगला अंडा जल्दी दे। जिंदगी भर पिंजरे में कैद रहने व चल फिर न सकने के कारण उसकी टांगे बेकार हो जाती हैं। जब उसकी उपयोगिता घट जाती है, तो उसे कत्लखाने भेज दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त अंडे अहिंसक व शाकाहारी कैसे हो सकते हैं?

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देवेन्द्र यादव चुनावी तैयारी में कहीं आगे निकल चुके https://garhbairat.com/devendra-yadav-has-gone-far-ahead-in-election-preparations/ https://garhbairat.com/devendra-yadav-has-gone-far-ahead-in-election-preparations/#respond Sun, 29 Dec 2024 04:53:47 +0000 https://garhbairat.com/?p=12399

अनिल चतुर्वेदी
दिल्ली में सरकार किसकी बनती है और कौन बनता है दिल्ली का सीएम यह तो बाद की बातें हैं लेकिन सच तो यह भी है कि कांग्रेस या भाजपा में नेता इस मक़सद से तो टिकट की माँग भी नहीं कर रहे और न ही हिम्मत जुटा पा रहे हैं पर हाँ यह ज़रूर है कि पब्लिसिटी और नंबर बनाने या फिर रुतबे के लिए पार्टियों के नेता केजरीवाल के रहते खुद को उनके सामने लाना चाह रहे हैं। नई दिल्ली से जीतने वाला नेता अक्सर सीएम का दावेदार रहा है सो आप पार्टी से पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस विधानसभा से मैदान आ चुके हैं ,कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप को अपना उम्मीदवार बना चुकी है रही बात भाजपा की सो अभी उम्मीदवार तय नहीं है।

दिसंबर के आखरि़ में उम्मीदवार तय किए जाने की उम्मीद है। यह अलग बात है कि पार्टी ने यहाँ से उम्मीदवारी को लेकर कई बार रणनीति बनाई पर नतीजा कुछ नहीं निकला। अब जो सबसे ज़्यादा दावेदारी कर रहे हैं वे हैं पूर्व मुख्यमंत्री स्व: साहिब सिंह वर्मा के बेटे और पूर्व सांसद प्रवेश साहिब सिंह । नेताजी बाहरी दिल्ली से सांसद रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में जिन छह सांसदों के टिकट पार्टी ने काटे थे प्रवेश उनमें से एक हैं। अब पार्टी ने भले प्रवेश के नाम की घोषणा यहाँ से चुनाव लडऩे के लिए नहीं की हो पर नेताजी ने इस विधानसभा की दीवारों को अपने नाम और यहाँ से लडऩे का संकेत देकर पाट दिया है। यही नहीं सोशल मीडिया और अख़बारों में भी इसी तरह की पिछले दिनों खबरें भी छपीं हैं।

बाहरी दिल्ली से ही लोकसभा चुनावों में पार्टी उम्मीदवार को समर्थन देने को लेकर भी अपने ये नेताजी सुर्खयि़ों में रहे थे। और तो और पिछले दिनों कार्यकर्ताओं की मीटिंग में भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए गए कि मानो वे नई दिल्ली से पार्टी उम्मीदवार है और सीएम के दावेदार हों । साथी नेताओं ने तो इस मीटिंग में यहाँ तक कह भी डाला कि उन्हें इन नेताजी को जिताना है पर शायद भाजपा की ज़मीन पर अभी ऐसा कुछ भी नहीं बताया जा रहा है। कि नेताजी उम्मीद हैं भी या नहीं । या यह मानिए कि अभी सिर्फ ख्याली पुलाव वाली बात है। यह ज़रूर है कि नेताजी ने इस मीटिंग में खान-पान की व्यवस्था ज़रूर की थी और नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज इसमें मौजूद थीं।अब भला नेताजी अपने संसदीय क्षेत्र की दस विधानसभाओं में किसी एक से लडक़र बाहर की नई दिल्ली से लडऩे की इच्छा क्यूं जता रहे हैं भाजपा ही नहीं बाक़ी राजनीतिक दलों में भी यह चर्चा का सवाल बना हुआ है।

यूँ नेताजी जाट विरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं पर नई दिल्ली विधानसभा में जाट वोटों की संख्या न के समान मानिए। यहाँ वाल्मीकि,धोबी ,वैश्य दलित, उत्तराखंड के और पंजाबी आदि वोटर तो हैं पर जाट या मुस्लिम वोटरों की संख्या तो बेहद कम है। ऐसे में अपने ये नेताजी किसके दम पर चुनाव का दम भर रहे हैं यह तो राम जाने पर हाँ अगर आकाओं का फ़ैसला साम दाम दंड भेद से जीतने का ही होगा तो बाक़ी तो सभी कुछ नगण्य ही होना है। यह बात दूसरी है कि खुद भाजपा के नेता भी अपने बूते 70 में से 20 से 25 सीटें जीत पाने के दम के साथ केजरीवाल की सरकार एक बार बनते देख रहे हैं। दिल्ली में सरकार किसकी बनती है यह भले इंतज़ार की बात हो लेकिन सरकार बनाने की कोशिश में तो फिलाहल भाजपा से कहीं आगे हैं। आप और भाजपा के ख़िलाफ़ तकऱीबन 60 जगहों पर प्रदर्शन और दिल्ली न्याय यात्रा निकाल कर कांग्रेस ने वोटरों के दिलों में कहीं न कहीं जगह ज़रूर बनाई है। या यूँ कहिए कि अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष देवेन्द्र यादव चुनावी तैयारी में कहीं आगे निकल चुके हैं। विधानसभा की 70 सीटों के लिए अब तक 21 सीटों के उम्मीदवार तय किए जा चुके हैं और दिसंबर के आखरि़ी दिनों में बाक़ी विधानसभाओं के उम्मीदवार तय कर दिए जाने हैं।

यह अलग बात है कि आप पार्टी अपनी तैयारी को लेकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती दिए हुए हैं पर यह भी ज़रूर है कि कांग्रेस दिल्ली की सत्ता में वापिसी के लिए हर कोशिश में लगी है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के साथ ही अड़ानी मामले को लेकर कांग्रेस अब हर रोज़ सडक़ों पर अपनी आवाज़ बुलंद करती दिख रही है। कांग्रेस नेताओं की मानो तो वह अपनी चुनावी तैयारी या दोनों सरकारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा यह बता देना चाहती है कि वह बाक़ी दोनों पार्टियों से कहीं कमतर नहीं है और पूरी मुस्तैदी के साथ दिल्ली जीतने के लिए चुनावी मैदान में उतरेगी। अब भले भाजपा कऱीब तीन दशक का अपना वनवास ख़त्म कर दिल्ली जीतने को बेताब हो पर फिलाहल तो वह आप ही नहीं बल्कि कांग्रेस से भी चुनावी तैयारी में पीछे है। कांग्रेस अगर 21 उम्मीदवार तय कर चुकी है तो आप के 31उम्मीदवार तय किए सजा चुके हैं। दिल्ली की गलियों और चौबारों तक आप के नेता संपर्क किए हुए हैं। महिला सम्मान योजना के तहत आप महिलाओं को हर महीने 2100 रूपये देने का भरोसा देकर अपना वोट बैंक तैयार करने में लगी है। मुफ़्त बिजली पानी ,बसों में मुफ़्त महिलाओं को यात्रा की सुविधा और अब 2100 रूपये की सौग़ात देकर वह भाजपा और कांग्रेस की आँखों की किरकिरी बनी हुई है। पर शहर में आप की चर्चा भी है। अब भाजपा के इरादे क्या हों यह दूसरी बात है पर दूसरे राज्यों में सबसे पहले उम्मीदवार तय करने वाली भाजपा दिल्ली में तो पिछड़ी दिख रही है। चर्चा तो यह भी है कि भाजपा की इस देरी के लिए कहीं न कहीं प्रदेश संगठन में बदलाव की खबर भी चल निकली है। कहा तो जा रहा कि विधानसभा चुनाव एक बड़ा चुनाव है और खास कर इस बार का सो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को बदल कर कोई बड़ा चेहरा सामने लाकर भी चुनावी मैदान में उतर सकती है। लेकिन वो कौन? बस इसी का इंतज़ार है।

यूँ नेताओं को भले मंदिर जाने की फ़ुरसत न होती हो पर चुनावों में उन्हें न सिफऱ् मंदिर जाना याद रहता है बल्कि वे पंडित ,ज्योतिषियों और मौलवियों की गणेश परिक्रमा से भी दूरी नहीं रख पाते हैं। या यूँ कहिए कि जीत के लिए ये कोई भी जतन करने को तैयार रहते हैं। फिर आप पार्टी के एक बड़े नेता कैसे चूकते आखरि़ इस बार सत्ता को लेकर भाजपा से आप-पार लड़ाई जो हैं। पर हाँ नेताजी मंदिर जांए और किसी आम आदमी की आँखें नेताजी से दो-चार हो जांए तो नेताजी का थोड़ा असहज होना भी लाज़मी ही है । ऐसा ही हुआ अपने आप पार्टी नेताजी का। नेताजी मंदिर पहुँचे पंडित जी से मिले ,गपशप हुई और बात आगे चली तो तो नेताज ने पंडित जी से चुनाव जीतने के लिए आशीर्वाद तो माँगा ही साथ ही विद्या भी । आखिर क्या जतन किया और क्या नहीं इसमें घंटा गुजर गया। अब भला ज्योतिषी ने क्या कहा और क्या नहीं यह तोसुनना मुश्किल ही था पर यह ज़रूर सुना गया कि एक तो पुराने विधायकों में बदलाव किया और दूसरे चुनाव चिन्ह या नहीं झाड़ू का रंग भी। भला अब ज्योतिषी की बात नेताजी की समझ में क्यों न आती। भला हो अपने आप पार्टी के उन नेताजी का कि वे ज्योतिषी की बात समझ बैठे।और तभी अब पार्टी हलकों में यह चर्चा शुरू हो ली है कि आप पार्टी के चुनाव चिन्ह और प्रचार सामग्री का रंग यानी झाड़ू और पोस्टर बैनर आदि। का रंग अब जल्दी ही सफ़ेद से काला कर दिया जाना है। यूँ काला रंग तो बुरी नजऱ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। तो आप पार्टी को किसी नजऱ लगती है और उसका नतीजा क्या आता है इंतज़ार इसका रहना ही है,अब यह अलग बात रही कि पार्टी की तरफ़ से यह जानकारी किसी को कब दी जाए।

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नदी जोड़ो अभियान, एक सदी का सपना https://garhbairat.com/linking-of-rivers-campaign-a-dream-of-a-century/ https://garhbairat.com/linking-of-rivers-campaign-a-dream-of-a-century/#respond Sat, 28 Dec 2024 05:39:41 +0000 https://garhbairat.com/?p=12372

भूपेन्द्र गुप्ता
नदी जोड़ो अभियान आज चर्चा का विषय है।  इसका श्रेय सभी पार्टियों लेने की कोशिश भी करती हैं लेकिन इन परियोजनाओं का इतिहास 100साल से भी अधिक पुराना है।इस इतिहास को जानकर यह समझा जा सकता है कि सपनों के फलीभूत होने में सैकड़ों साल  की तपस्या शामिल होती है ।इसमें कोई एक व्यक्ति अकेला नहीं है,बल्कि सरकारों के निरंतर और सकारात्मक प्रयास हैं।हालांकि गुलाम भारत मे 1900 के दशक में एक अंग्रेज इंजीनियर आर्थर कॉटन ने भारत की नदियों को जोडऩे की कल्पना की थी ।उसका उद्देश्य था कि नदियों के अतिरिक्त जल से बड़ी-बड़ी नहरें बनाकर जल मार्गों की वृद्धि की जा सकती है जिससे ब्रिटिश सरकार को व्यापारिक सुविधा मिलेगी तथा दक्षिण भारत के तथा उड़ीसा के सूखे से निपटा जा सकेगा और वहां पर अतिरिक्त जल भेज कर उत्पादन में वृद्धि भी की जा सकेगी ।किंतु इसमें आने वाले खर्च को देखकर ब्रिटिश हुकूमत भी आगे नहीं बढ़ी और यह ठंडे बस्ते में चली गई।

देश आजाद हुआ और राष्ट्र निर्माण की योजनायें बननी शुरू हुईं।गरीबी संसाधनों के अभाव और तकनीशियनों की कमी से प्रथमिकताये आगे बढ़ती गईं। आजादी के  लगभग 23 साल बाद जब इंदिरा जी की सरकार में डा़ के एल राव जो कि बांध बनाने वाले इंजीनियर थे,सिंचाई मंत्री बने तब उन्होंने आर्थर काटन के इस सपने से धूल झाड़ी और इंदिरा जी के सामने रखा।कांग्रेस ने 1970 में   इस योजना को नये दृष्टिकोण से जीवित किया।  डा. के एल राव की सोच थी कि जो हिमालयीन नदियां हैं उनमें ग्लेशियरों के पिघलने के कारण गर्मियों में अतिरिक्त जल होता है और बाढ़ आती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियां गर्मियों में सूख जाती हैं और उनमें बरसाती मौसम में बाढ़ आती है अत: हिमालयीन नदियों और  प्रायद्वीपीय नदियों की आपस में जोड़ दिया जाता है तो सूखे के मौसम में जल की उपलब्धता बनी रह सकती है इसे इंटर-वेसिन रिवर लिंकिंग कहा गया।  इंदिरा गांधी ने 1980  में इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए एनडीआरडी की रिपोर्ट तैयार करवाई ।इसकी वित्तीय व्यवस्था बनाने के लिए शुरुआत की गई और उन्होंने 1982 में   नेशनल वाटर डेवलपमेंट अथॉरिटी का निर्माण किया यह नदी जोड़ो अभियान का पहला कदम था।इसके अंतर्गत इंटर-वेसिन नदियों को जोडऩे की योजनाओं पर कार्य शुरू हुआ ।कध्धययन हुए रिपोर्टें तैयार हुईं।

जब 1999 में एनडीए की सरकार आई और अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इसे  उलटकर योजना के पूरे स्वरूप को ही बदल दिया और इंटर-बेसिन परियोजनाओं को इंट्रा-वेसिन परियोजनाओं में बदल दिया किंतु 2003 तक यह विचार स्वरूप लेता इसके पहले ही 2002 में सुप्रीम कोर्ट में इसके विरोध में पीआईएल लग गई ।आगामी चुनाव में बाजपेयी सरकार उलट गई और 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार का गठन हुआ। तब इस परियोजना को फिर वास्तविक स्वरूप  यानि इंटर- बेसिन योजना के रूप में जीवित किया गया तथा सरकार ने इस पर व्यापक अध्ययन करवाया ।

साल 2012 में जब सुप्रीम कोर्ट में यह फैसला दिया कि नदियों के इंटरलिंकिंग का फैसला नीतिगत है और इसे सरकारें ही करें ।तब इस योजना के लिए 2012 से गति प्रदान की गई विभिन्न राज्यों के जल बंटवारे के आपसी समझौते और विवादों के निपटारे, पर्यावरणीय जोखिम एवं इकोसिस्टम को पहुंचने वाले नुकसानों के अध्ययन करते-करते और सुलझाते-सुलझाते 2021 में केन बेतवा योजना को कैबिनेट की स्वीकृति मिली जिसका भूमि पूजन वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया है। इंटर बेसिन नदी जोड़ो परियोजना मूलत आर्थर कॉटन का सपना था जिसे  डॉक्टर केएल राव ने आगे बढ़ाया और इंदिरा गांधी  की सरकार ने इसे संस्थागत स्वरूप प्रदान कर राष्ट्रीय जल विकास अथॉरिटी का निर्माण किया और इस अथॉरिटी ने ही इस कल्पना को जमीन पर उतारने की शुरुआत की ।संसाधन जुटाये, अध्ययन करवाया और यह योजना लगभग  54 साल बाद अब आकार ले रही है ।

आज देश में विकास को एक निरंतर अवधारणा के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है। इसका श्रेय अकेली एनडीए सरकार को देना आर्थर कॉटन के सपने के साथ भी धोखा होगा और डा. के एल राव तथा इंदिरा गांधी की संकल्पना के साथ भी बेईमानी होगी । विकास की योजनाओं की निरंतरता के लिए जिन-जिन लोगों ने काम किया है सभी सरकारों को श्रेय दें इसमें इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेई, मनमोहन सिंह एवं नरेंद्र मोदी सभी शामिल हैं ।सपनों के जमीन पर उतरने की यही सच्चाई है।

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मोदी-शाह राज में सब मुमकिन https://garhbairat.com/everything-is-possible-in-modi-shah-rule/ https://garhbairat.com/everything-is-possible-in-modi-shah-rule/#respond Fri, 27 Dec 2024 05:05:51 +0000 https://garhbairat.com/?p=12333

हरिशंकर व्यास
इस सप्ताह नीतीश कुमार को भारत रत्न देने का कयास सुना तो वही उद्धव ठाकरे ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की। जबकि सरकार ने सर्वत्र अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर का कीर्तन बनाया हुआ है। तो क्यों नहीं मोदी सरकार अपने दिल में बसे डॉ. भीमराव अंबेडकर को दिखाने के लिए इस जनवरी उनके पोते प्रकाश अंबेडकर को भारत रत्न से नवाज देती है? हालांकि कांशीराम, मायावती भी दलितों के आईकॉन हैं!

हां, मोदी-शाह राज में सब मुमकिन है। आखिर यथा राजा तथा प्रजा के सत्य में टके सेर भाजी टके सेर खाजा भी तो हम हिंदुओं का इतिहासजन्य अनुभव है। कुछ भी संभव है! बस, राजा के कान में हेडलाइन’ का मंत्र फूंक जाए। सोचें, अंबेडकर शब्द के मंत्र पर! भाजपा जन्म से आज तक कभी भी अंबेडकर के नाम पर, दलित वोटों से नहीं जीती। हमेशा रामजी, हिंदू वोट, हिंदू राजनीति से जीती। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को न गुजरात में, न बनारस में कभी थोक दलित वोट मिले और न हाल में महाराष्ट्र, झारखंड के चुनावों में मिले। यह भी सत्य है कि संविधान पर हुई बहस में अमित शाह के कहे में कुछ भी गलत नहीं था।

अमित शाह का कहना था- हमारे संविधान को कभी भी अपरिवर्तनशील नहीं माना गया। समय के साथ साथ देश भी बदलना चाहिए। समय के साथ कानून भी बदलने चाहिए और समय के साथ साथ समाज भी बदलना चाहिए।ज्अब ये एक फ़ैशन हो गया है। आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकरज् इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।

भाषण का यह अंश संसद कार्यवाही का हिस्सा है। तब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कान में किसने यह मंत्र फूंका कि राहुल गांधी के इस ट्विट (मनुस्मृति मानने वालों को अंबेडकर जी से तकलीफ़ बेशक होगी ही) से दलित भडक़ेंगे? और भविष्य में प्रधानमंत्री बनने का आपका सपना बिखर जाएगा इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस को अंबेडकर विरोधी करार देने के लिए भाजपा पिल पड़े! तभी संसद परिसर मानों आर-पार की लडाई का पानीपत हुआ। सोचें, बैठक खाने में सावरकर, चाणक्य की तस्वीर लगाए अमित शाह की अंबेडकर पर पहले स्पष्टवादिता, फिर रक्षात्मक, आक्रामक होने की इस राजनीति पर। भला राहुल गांधी, खडग़े के मनुस्मृति के जुमले से भाजपा का क्या कोई वोट खराब होता है? अंबेडकर का पोता प्रकाश अंबेडकर दशकों की दलित राजनीति के बावजूद आज भी जीरो है। मायावती जब तक तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा लगाती थी तब तक सडक़ पर रही और मनुस्मृति के वंशज ब्राह्मणों को हाथी नहीं गणेश का नारा लगा पटाया तो सत्ता में आईं!
ऐसे ही आरएसएस के लाठीधारियों के लिए हमेशा पूजनीय यदि सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर थे और उन्हीं की बदौलत अंतत: हिंदू राजनीति को केंद्र का शासन मिला तो मोदी-शाह को सावरकर के सत्य पर अटल रहना चाहिए था या कांग्रेस पर यह पलट वार करना था कि हम असली अंबेडकरवादी हैं और कांग्रेस ने उन्हें धोखा किया जबकि हमने अंबेडकर को भारत रत्न दिया!

तभी नैरेटिव के अधबीच उद्धव ठाकरे का संघ परिवार को यह थप्पड़ है जो (सावरकर पर राहुल गांधी की टिप्पणी के ताजा संदर्भ में) उन्होंने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की। उन्होंने देश-दुनिया को बताया है कि मोदी राज अंबेडकर, अंबेडकर तो कर रहा है लेकिन जिस हिंदुवाद तथा संघ परिवार की बदौलत मोदी-शाह सत्ता भोग रहे हैं उसके पितामह सावरकर को अभी तक इस मोदी राज ने भारत रत्न क्यों नहीं दिया? अंबेडकर को दिया और उन्हें नहीं दिया तो यह कथित हिंदुत्व, हिंदू राजनीति की अहसानफरामोशी है या नहीं? जब प्रणब मुखर्जी से कर्पूरी ठाकुर तक तमाम लोगों को भारत रत्न बांट दिए तो आरएसएस के हेडगेवार, गोलवलकर को भी बांट देते? ये क्या अंबेडकर, अंबेडकर कर उनसे अपनी वफादारी दिखा रहे हैं? वही यदि अपने सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर का ही नाम ले लिया होता तो कम से कम अपने वंश, अपनी विचारधारा के तो सगे कहलाते!

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उस्ताद जाकिर हुसैन अपने प्रशंसकों को आह भरता छोड़ गए https://garhbairat.com/ustad-zakir-hussain-left-his-fans-sighing/ https://garhbairat.com/ustad-zakir-hussain-left-his-fans-sighing/#respond Thu, 26 Dec 2024 04:53:27 +0000 https://garhbairat.com/?p=12294

आलोक पराडक़र
उस्ताद जाकिर हुसैन को भारतीय शास्त्रीय संगीत का सुपरस्टॉर कहना गलत न होगा। साधक तो वे तबला के थे, जिसे मुख्यत: संगत वाद्य ही माना गया है, लेकिन उनकी लोकप्रियता सब पर भारी थी। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के संभवत: सर्वाधिक पारिश्रमिक लेने वाले कलाकार थे, उनके कार्यक्रमों के लिए आयोजकों को लंबा इंतजार करना होता था, उनका आकषर्ण ऐसा था कि फिल्मों और विज्ञापनों में भी उन्हें लिया जाता रहा। वे विश्व में भारत के सांस्कृतिक राजदूत भी थे और प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के बाद वे ही थे जिन्होंने विभिन्न देशों में भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाया और एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार किया। ग्रैमी’ जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड में भी उन्होंने भारतीयता का परचम लहराया, लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर होने और अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उनके काम में कहीं समझौता नहीं था। वास्तव में उनमें नाम और काम का संतुलन कुछ वैसा ही था जैसा उनके तबले में बाएं और दाएं का। उनकी उपस्थिति जहां समारोहों की सफलता का पर्याय थी, वहीं उनकी संगत से मुख्य कलाकार का कार्यक्रम भी निखर उठता था। लंबे समय की सफलता उनकी विनम्रता को बदल नहीं सकी थी। हंसमुख, हाजिर जवाब और हरदिल अजीज उस्ताद जाकिर हुसैन अपने व्यक्तित्व में भी कृतित्व जैसी खूबसूरती जीवनपर्यत कायम रख सके।

तबले को मुख्यत: संगत का वाद्य ही माना गया है, लेकिन उस्ताद जाकिर हुसैन उन कुछ तबला वादकों में थे जिन्होंने इसे एकल और मुख्य वाद्य के रूप में भी स्थापित किया। वे जब लोकप्रिय होने लगे तो पिता के साथ उनकी जुगलबंदी का चलन खूब था। पिता-पुत्र का तबला वादन खूब पसंद किया जाता था। उस्ताद जाकिर हुसैन के एकल वादन की खास बात यह भी होती कि उन्होंने अपने वादन को शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञों के योग्य ही नहीं बनाया बल्कि इसे आम लोगों के लिए भी रुचिकर बना दिया था। जिस प्रकार प्रख्यात कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज अपनी तिहाइयों को दर्शकों को समझाने के लिए तरह-तरह की कथा-प्रसंगों का सहारा लेते थे, कभी चिडिय़ों का उदाहरण देते तो कभी बच्चों के गेंद खेलने का, उस्ताद जाकिर हुसैन भी तबले पर कभी डमरू, कभी मंदिर की घंटी, कभी रेल तो कभी घोड़े की टाप का वादन करते हुए आम लोगों में भी अपनी गहरी पैठ बना लेते थे।

शास्त्र को लोकप्रिय मुहावरे में इस प्रकार ढाल लेने का कौशल उन्हें खूब आता था, लेकिन ऐसा नहीं था कि वे एकल वादन के ही उस्ताद थे। एकल वादन के साथ ही उनकी संगत की भी खूब मांग और धूम थी। वे जब संगत करते तो कार्यक्रमों का एक नया ही रंग बन जाता। पहले प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के साथ और फिर प्रख्यात बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, प्रख्यात संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा, प्रख्यात कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज जैसे कलाकारों के साथ उन्होंने खूब कार्यक्रम किए। शिव-हरि के साथ उनकी संगत खूब फबती थी जिसके कई वीडियो आज भी यू-ट्यूब पर देखे जा सकते हैं। हालांकि उन्होंने हर प्रमुख कलाकार के साथ संगत की, शास्त्रीय संगीत से लेकर सुगम और फिल्म संगीत तक, वरिष्ठ एवं प्रख्यात कलाकार से लेकर युवा और उभरते कलाकारों तक, उन्होंने सबके साथ बजाया।

लोकप्रिय पाश्र्व गायक हरिहरन के साथ गजलों के अलबम में उनकी उपस्थिति साफ नजर आती है। उस्ताद जाकिर हुसैन ने संगत को लेकर अपने दृष्टिकोण से जुड़ा एक बड़ा जरूरी किस्सा एक बार लखनऊ में बताया था। उन्होंने बताया था कि मैं 17 साल का था और पंडित रविशंकर के साथ यात्रा पर था। एक कार्यक्रम हुए, दूसरा कार्यक्रम हुआ, मैंने रविशंकर जी से पूछा कि कैसा हो रहा है? रविशंकर ने कहा कि तुम मेरे साथ तबला बजाते हो लेकिन मुझे देखते क्यों नहीं? उसके बाद शाम को जब कार्यक्रम हुआ तो उस्ताद जाकिर हुसैन पंडित रविशंकर की ओर थोड़ा और घूमकर बैठ गए। उस दिन संगत की एक नई किताब खुल गई। वह पंडित को देखकर बजाने लगे और उन्हें समझ में आने लगा कि संगत कैसे करनी है। वह कहते थे कि जब आपकी तालीम होती है तो आपकी एकल वादन की तालीम होती है। आप सीखी हुई चीजें बजा देंगे और आपकी प्रशंसा हो जाएगी, लेकिन जब तक संगत करना नहीं आएगा तब तक आप तबलिए नहीं बन सकते।

वह यह भी कहते थे कि सभी रंग का तबला आपके तबले में समाहित नहीं है तो आप एक अच्छे संगतकार नहीं बन सकते। सिर्फ दिल्ली का बजाकर, सिर्फ बनारस का बजाकर, सिर्फ पंजाब का बजाकर आप अच्छे संगतकार नहीं बन सकते। हालांकि उस्ताद जाकिर हुसैन कभी भी संगत में हावी होने की कोशिश नहीं करते थे, अपनी लोकप्रियता का दंभ नहीं दिखाते थे,  वे मुख्य कलाकार की जरूरत और सोच के अनुसार ही तबला वादन करते थे लेकिन कई बार ऐसा भी होता था कि उनकी लोकप्रियता पूरे कार्यक्रम में हावी हो जाती थी। ऐसे में यह भी हुआ कि कई कलाकार उनकी लोकप्रियता से आक्रांत होने लगे, उनसे परहेज करने लगे। उस्ताद जाकिर हुसैन भारतीय संगीत के सांस्कृतिक राजदूत भी थे। ज्यादातर प्रसिद्ध कलाकार विदेश में कार्यक्रम करते हैं, कई-कई महीने वहां गुजारते हैं, लेकिन प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के बाद उस्ताद जाकिर हुसैन ही थे जिन्हें विश्व के संगीतप्रेमियों ने सिर-आंखों पर बिठाया। वे लंबे समय से अमेरिका  में ही रहते थे। विभिन्न देशों के संगीत के साथ उनके कार्यक्रम भी खूब होते थे।

इन सबके बावजूद वे भारत में भी लगातार सक्रिय रहते थे। अपने सुदर्शन व्यक्तित्व के कारण उन्हें फिल्मों में अभिनय करने का आमंतण्रमिला था। विज्ञापन में तो वे बहुत पहले ही आ चुके थे। उनके समकालीन मानते थे कि उनकी लोकप्रियता में बड़ा योगदान विज्ञापनों का भी रहा है, जिसके कारण वह घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। वाह उस्ताद उनके नाम से जुड़ गया था, लेकिन अचानक वे अपने प्रशंसकों को आह भरता छोड़ गए।

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हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नजारा https://garhbairat.com/everywhere-there-is-a-view-like-kumbh-mela/ https://garhbairat.com/everywhere-there-is-a-view-like-kumbh-mela/#respond Wed, 25 Dec 2024 05:09:13 +0000 https://garhbairat.com/?p=12264

श्रुति व्यास
घूमने के सारे ठिकाने, पर्यटन स्थल चाहे कितने ही मनमोहक क्यों न हों, वहां कुंभ की रेलमपेल मची रहती है। जबकि छुट्टियों का एक मकसद भीड़-भाड़ से दूर जाना भी होता है। भारत भर में पूरे साल हर तरह के पर्यटन स्थल-बीच हों या पहाड़, तीर्थ हो या नेशनल पार्क-हमेशा बुक रहते हैं। हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नज़ारा रहता है।
गहरा नीला आसमान और हवा में झूमते ताड़ के वृक्ष। बालकनी से मैं ज़मीन पर बिछी सफ़ेद रेत का अंतहीन सिलसिला देख सकती हूँ। धूप ठीक उतनी गर्म है, जितनी होनी चाहिए। दूर कहीं से समुद्र की लहरों के तट से टकराने की आवाज़ आ रही है। मै अक्सर मनपसिंदा ‘रोज’ पेय की चुस्कियां लेती हूँ और साथ-साथ बीच में चॉकलेट केक के टुकड़े भी मुंह में डालती हूँ। यहाँ की हर सुबह हेमंत जैसी है और हर शाम, वसंत जैसी। यह स्वर्ग है। यहाँ सपने हकीकत बन जाते हैं। यहाँ आनंद ही आनंद है। और मैं यहाँ तब तक रहूंगी जब तक कि सर्दी का मौसम विदा नहीं हो जाता। और फिर मेरी आँख खुल जाती है!

मैं तो दिल्ली में हूँ-जापान में बने गर्म कपडे पहनकर, अंग्रेज़ इंजीनियरों द्वारा डिजाईन किये हुए एयर प्युरिफायर के बगल में। हवा जहरीली है। और आँखें जल रही हैं, नाक बह रही है। मैं ‘रोज़’ नहीं बल्कि ‘काढ़ा’ पी रही हूँ। ‘चॉकलेट केक’ नहीं बल्कि ‘च्यवनप्राश’ खा रही हूँ। खिडक़ी के पास अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ कर आकाश में एक के बाद हवाईजहाजों को उड़ान भरते देख रही हूँ। वे अपने यात्रियों को उन सुन्दर जगहों पर ले जा रहे हैं, जहाँ के बारे में मैं केवल सोच सकती हूँ। हाय री किस्मत! मेरा मन खिन्न हो जाता है।

ईमानदारी की बात तो यह है कि दिल्ली एकदम बेदिल हो गई है। वे चीज़ें जो दिल्ली को एक आकर्षण, एक चरित्र और एक व्यक्तित्व देती थीं, गुमशुदा हैं। यहाँ बहुत ज्यादा लोग हैं, बहुत ज्यादा। हर जगह को खोद डाला गया है, मोहल्लों-सडक़ों  के नाम बदल दिए गए हैं, नल का पानी काला होता है, हवा काली हो गई है। यह शहर अब चाट प्रेमियों का स्वर्ग नहीं रहा। अब यहाँ मोमो का राज है। अजीब सी मूर्तियाँ-बेढब और निरीह सी-कई जगह ऊग आईं हैं। नई उम्र के लडक़े-लड़कियों को वे रील बनाने के लिए एकदम उपयुक्त लगती हैं।

शहर में इतनी भीड़ है कि इटली के दूतावास में बड़े दिन, क्रिसमस के मेले में घुसने पर ऐसा लगता है मानों आप कुम्भ मेले में हों। यह शहर एक समय उत्कृष्ट संस्कृतियों और पाक शैलियों का गुलदस्ता था, उनका मिलन स्थल था। अब यहाँ ज़हर है-हवा में भी और लोगों के दिलों में भी। मैं अपने आप को भाग्यवान मानती हूँ कि मैं उस दिल्ली में पली-बढ़ी जो सदियों से सत्ता का केंद्र थी, जिसकी अपनी शान थी, जो अपने लोगों, अपनी इमारतों और अपने खान-पान के लिए जानी जाती थी। यहाँ की सर्दियों खुशनुमा हुआ करती थी। चमकीली धूप, नीला आकाश और चारों तरफ खिलखिलाते बोगेनविलिया। करीने से छटाई किये हुए पौधों और पेड़ों से भरे पार्कों में हम परिवार या दोस्तों के साथ पिकनिक मनाते, खाना खाते, क्रिकेट और लूडो खेलते या अलसाते हुए अगाथा क्रिस्टी या ब्रोंटी पढ़ते। अचार को सुखाने के लिए छत पर धूप में रखा जाता था, सर्दियों में गर्मी के लिए आलू के चिप्स बनाये जाते थे और माएं बच्चों को जबरदस्ती मूली खिलाती थीं। सैलानी पुरानी दिल्ली की गलियों की ख़ाक छानते थे और इंडिया गेट-जब वह इंडिया गेट हुआ करता था-पर स्थानीय लोगों की भीड़ जुटती थी। शाम की हवा साफ़-सुथरी और ठंडी हुआ करती थी। आप घर में बनी स्वेटरें पहनें अलाव के आसपास बैठकर, हॉट चॉकलेट पीते हुए रेवडिय़ाँ टूंगते थे-कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य हुआ करता था जैसा कि भारतीय फिल्मों में क्रिसमस का दिखाया जाता है।
मगर अब दिल्ली न तो आदर्श राजधानी बची है और ना ही आदर्श शहर। वह ऐसी जगह भी नहीं है जहाँ आप घूमने जा सकते हैं। पार्कों की कटाई-छटाई नहीं होती और वे हँसते-खेलते परिवारों से भरे नहीं रहते। हवा ऐसी नहीं है जो अचार को अचार बना सके और चिप्स को सुखा सके। विदेशी सैलानियों के लिए दिल्ली अब गोल्डन ट्रायंगल की यात्रा का एक पड़ाव भर है। स्थानीय लोग शहर से बाहर जाने के लिए आतुर रहते हैं-चाहे वह एक वीकेंड के लिए ही क्यों न हो।

जिस स्वर्ग में होने का सपना मैं देख रही थी, दुर्भाग्यवश, वह बहुत दूर है और इतनी जल्दी वहां जाने का कार्यक्रम बनाना मुमकिन नहीं है। कुल मिलाकर, सर्दियों में फ्रेंच रीविएरा जाने की योजना एक और साल के लिए मुल्तवी! दिल्ली और उसके उदास मौसम, और समुद्र के किनारे गुनगुनी धूप का मज़ा लेने का एक और मौका खो देने पर मेरी झल्लाहट और बड़बड़ाना सुन कर मेरे पिता कुछ गुस्से से बोले, तो तुम गोवा ही चली जाओ। वाह, क्या घिसापिटा मशविरा है, मैंने तुरंत कहा। आप मॉरिशस, सेशेल्स या मालदीव जाने के लिए भी तो कह सकते थे। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और उन्हें समझ आ गया कि मैं सही कह रही हूँ। वैसे मैं बता दूं कि ऐसे मौके कम ही आते हैं!

मैं जानती हूँ कि दिव्य और स्वर्गिक समुद्री बीचों वाले इन देशों के मोदी के भारत से सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं हैं और हमारी सरकार ने ढेर सारे देशी पर्यटन स्थलों के उनसे बेहतर होने के बारे में इतना शोर मचाया है कि गोवा का नाम जुबान पर आ जाना एकदम स्वाभाविक है। मगर समस्या यह है कि हमारे अपने पर्यटन स्थल चाहे कितने ही मनमोहक क्यों न हों, वहां लोगों की रेलमपेल मची रहती है। जबकि क्या छुट्टियां मनाने का एक मकसद भीड़-भाड़ से दूर जाना नहीं होता? मगर फिर भी, अपने मन को बहलाने के लिए मैंने गोवा, पोंडिचेरी, कोवलम, अंडमान-भारत के लगभग सभी समुद्री तट के पर्यटन स्थलों की यात्रा के लिए फ्लाइट और होटलें खोजना शुरू कीं। मगर अफ़सोस, मुझे कहीं भी जाने के लिए फ्लाइट और रुकने के लिए ठीक-ठाक होटल में जगह नहीं दिखी। सब कुछ पहले से ही बुक था-कहीं कोई जगह नहीं है। मैं शायद नीमराना भी नहीं जा पाऊंगी!

और यह साल के इस समय की बात नहीं है। भारत भर में पूरे साल हर तरह के पर्यटन स्थल-बीच हों या पहाड़, तीर्थ हो या नेशनल पार्क-हमेशा बुक रहते हैं। हर जगह कुम्भ के मेले जैसा नज़ारा रहता है। बहरहाल, एक बार फिर, लगातार पांचवें बरस, मेरा हॉलिडे सीजन दिल्ली में ही कटेगा। हवा और गन्दी होती जाएगी। और चूँकि मेरी कार बीएस-4 है, इसलिए मैं शहर में भी नहीं घूम पाऊँगी। जापान में बने गर्म कपडे पहनकर, अंग्रेज़ इंजीनियरों द्वारा डिजाईन किये हुए एयर प्युरिफायर के बगल में खिडक़ी के पास अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ कर मैं पेड़ों को धूसर रंग ओढ़ते देखूँगी और देखूँगी धूसर आकाश में उड़ान भरते हवाईजहाजों की टिमटिमाती रौशनियाँ। और कहवा के हर घूँट के साथ यहीं सोचूंगी कि काश मैं भी इनमें से किसी जहाज़ में बैठी, नीले आकाश और ताड़ के पेड़ों की दुनिया की तरफ उड़ी जा रही होती।

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